|| कलियुग का उद्धार - श्री कल्कि अवतार || 

|| कलियुग का उद्धार - श्री कल्कि अवतार || 

श्रीमद परम गुरुभ्यो नमः

षडंगादि वेदो मुखे शास्त्र विद्या,
कवित्वादि गद्यम, सुपद्यम करोति।
मनश्चैन लग्नम गुरोरंघ्रि पद्मे,
ततः किं, ततः किं, ततः किं, ततः किं।।

भावार्थ – आप के होठों पर सभी वेद एवं उनके छः अंग हों, आप सुंदर कविता करते हों, गद्य पद्य की सुंदर रचना करते हों, पर आप का मन यदि गुरु के चरणकमलों में न लगता हो तो इन सब का क्या अर्थ है, क्या अर्थ है, क्या अर्थ है, क्या अर्थ है!

श्रीमद परम गुरुभ्यो नमः

गुरु ही जीवन का मूल स्रोत हैं — वही जो अंधकार से प्रकाश की ओर, भ्रम से ब्रह्म की ओर, और असत्य से सत्य की ओर ले जाते हैं। गुरुपूर्णिमा का पावन अवसर श्रद्धा, समर्पण और ज्ञान का अनुपम संगम होता है, और ऐसा ही दिव्य उत्सव सम्पन्न हुआ श्री कल्कि धाम, सम्भल की पावन धरा पर श्री कल्किपीठाधीश्वर आचार्य प्रमोद कृष्णम जी महाराज के दिव्य सान्निध्य में।

इस आध्यात्मिक उत्सव में देशभर से आए श्रद्धालुओं और गुरुभक्तों ने भाग लेकर गुरु चरणारविन्द पूजन एवं मन्त्र दीक्षा प्राप्त की। यह दीक्षा केवल एक विधि नहीं थी, अपितु आत्मा के पुनर्जन्म की प्रक्रिया थी — जहाँ शिष्य ने अपने समस्त पूर्वाग्रह, अज्ञान और अहंकार को गुरुचरणों में समर्पित कर, ज्ञान, भक्ति और चेतना का नवस्नान किया।

इस अनुपम अवसर पर श्री कल्कि धाम में वैदिक मंत्रोच्चार, यज्ञ, ध्यान, कीर्तन द्वारा श्री कल्कि नारायण एवं पूज्य गुरुदेव की वंदना की दिव्य गंगा प्रवाहित होती रही। सैकड़ों की संख्या में उपस्थित साधकों ने सामूहिक भाव से दीक्षा लेकर जीवन में नवनिर्माण का संकल्प लिया।